Monday, 25 July 2016

कश्मीर : भारत , पाकिस्तान और चीन की तुलनात्मक तस्वीरें

कश्मीर की समस्या केवल भारत की नहीं रह गयी है ..चूँकि कश्मीर भारत -पाकिस्तान-चीन में बंट गया है इसलिए यह समस्या भी इन तीनों देशों के बीच की रह गयी है ....चीन और पाकिस्तान दोनों मिलकर कश्मीर के भारतीय हिस्से को हड़पना चाहते हैं , पर वे अपनी करतूतों पर चूं भी  नहीं बोलना चाहते ...इसलिए जरा अपने देश के नागरिकों के प्रति इनके नज़रिए की परख कर ली जाये फिर भारतीय कश्मीर की बात करते हैं .........        १) बलवारिस्तान का मुद्दा और पाकिस्तान-चीन के फ़रेब

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने 14 जनवरी को इस्लामाबाद में एक बैठक बुलाकर गिलगित-बाल्तिस्तान को संवैधानिक रूप से एक अलग प्रान्त का दर्जा देने को कहा। प्रधानमंत्री के विदेशी मामलों के सलाहकार के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने पाकिस्तान के संविधान में अनुच्छेद एक में संशोधन करके गिलगित-बल्तिस्तान को पाँचवें प्रान्त के रूप में मान्यता देने की संस्तुति की गई है। इसके प्रतिरोध में तथाकथित ’आजाद जम्मू और काश्मीर’ (पाक अधिक्रांत जम्मू और काश्मीर) की विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित करके इस प्रयास को नकार दिया। विधान सभा ने एकमत से यह स्पश्ट कर दिया कि ’गिलगित-बल्तिस्तान जम्मू-काश्मीर राज्य को अभिन्न अंग है। यह बात ऐतिहासिक रूप से चीन-पाकिस्तान के सीमा समझौते, पाकिस्तान के उच्चतम न्यायालय के निर्णयों से भी सिद्व होती है। विधायी प्रस्ताव ने इस प्रयास को आपत्तिजनक कहा और इस्लामाबाद को हडबड़ी में कोई कदम न उठाने का आगाह किया।’ एकमत से पारित दो प्रस्तावों के माध्यम से यह याद दिलाने की कोशिश कि 3 मार्च 1949 ई. को हुए त्रिपक्षीय समझौते में गिलगित-बल्तिस्तान के लोग या नेतृत्व षामिल नहीं था।
वर्तमान समय में जम्मू-काश्मीर प्रान्त का सम्पूर्ण क्षेत्रफल 222,236 वर्ग किमी है जिसमें 101,437 वर्ग किमी भारत के पास है। शेष भूमि पाकिस्तान और चीन के नियंत्रण में है। गिलगित-बाल्तिस्तान क्षेत्र जम्मू और काश्मीर राज्य का हिस्सा है। वर्तमान में, यह पाकिस्तान के नियंत्रण में है। इस क्षेत्र से भारत की 106 किमी. सीमा अफगानिस्तान से मिलती है। भारतीय स्वतंत्रता के समय जम्मू और काश्मीर राज्य पर पाकिस्तान के सैनिकों ने कबिलाई रूप में हमला किया था जिससे कुछ भू-भाग पाकिस्तान के हिस्से में रहा गया। इसके दो भूभाग हैं- ग़ुलाम काश्मीर और गिलगित-बाल्तिस्तान।
गुलाम काश्मीर (मीरपुर-मुजफ्फराबाद) क्षेत्र को भारत की ओर कोई अधिकारिक नाम नही है, पाकिस्तान इसे ’आजाद काश्मीर’ कहता है। मुजफ्फराबाद इसकी राजधानी है। मीरपुर का हिस्सा जम्मू संभाग से है और मुजफ्फराबाद काश्मीर संभाग का हिस्सा है। यह 13297 हजार वर्ग किमी. पाकिस्तान के अनाधिकृत कब्जे में है। इस भाग पर पाकिस्तान प्रत्यक्ष रूप से शासन करता है। यहीं की विधानसभा ने विलय के विरोध में प्रस्ताव पारित किया है क्योंकि तथाकथित आजाद काश्मीर का यह मानना है कि गिलगित-बल्तिस्तान को पाकिस्तान का प्रान्त बनाने से ’स्वतंत्र’ जम्मू और काश्मीर राज्य की माँग को क्षति पहुचेगी।  
गिलगित-बाल्तिस्तान
उत्तरी क्षेत्र (वर्तमान गिलगित-बाल्तिस्तान) को लेकर ब्रिटिश सरकार व जम्मू और काश्मीर राज्य के बीच लीज संधि थी जिसके माध्यम से यह ब्रिटिश सरकार के शासन में था। भारत के स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के अधिनियम धारा 7 (1) (ब) के तहत ब्रिटिश सरकार और राज्य सरकार के संबंध समाप्त हो जाने से, यह संधि भी समाप्ति हो गई । इस क्षेत्र पर प्रशासनिक नियंत्रण जम्मू और काश्मीर सरकार पुर्नस्थापित हो गया। लीज संधि के समाप्ति के बाद जम्मू और काश्मीर की सरकार ने 17 जुलाई 1947 को आदेश संख्या बी 480/47 पी. बी. के माध्यम से अपना राज्यपाल या गर्वनर नियुक्ति किया। ब्रिगेडियर गनसारा सिंह ने 30 जुलाई को गिलगित पहॅुचकर पदभार ग्रहण किया और ले. कर्नल बेकन को सेवामुक्त किया।
उस समय में, गिलगित-बाल्तिस्तान को ’उत्तरी क्षेत्र’ के नाम से जाना जाता था और पाकिस्तान ने 2009 ई. से इसे  ’गिलगित-बल्तिस्तान’ के नाम से संबोधित किया है। यह भारत का उत्तरी सीमांत है। इसका क्षेत्रफल 72494 हजार वर्ग किमी है। इसकी राजधानी गिलगित है। यह वह क्षेत्र है जहाँ कई देशों की सीमाएं आपस में मिलती है - यह क्षेत्र पूर्व में लद्दाख व तिब्बत, उत्तर में चीन का जिंगजांग प्रान्त,  पश्चिमोत्तर में अफगानिस्तान, व तजाकिस्तान, पश्चिम में चित्रराल, दक्षिण में दिर, स्वता, कोहिस्तान व कागन उत्तर-पष्चिम प्रान्त और दक्षिण-पूर्व में काश्मीर घाटी है। यह मध्य एशिया से जोड़ने वाला दुर्गम क्षेत्र है जो सामरिक दृश्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है तथा जिसके द्वारा पूरे एशिया पर नियंत्रण किया जा सकता है।
                पाकिस्तान गिलगिल-बाल्तिस्तान पर एक उपनिवेश की भांति शासन करता है। यहाँ के लोगों को मानवीय अधिकारों और मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित कर रखा है। आर्थिक संसाधनों के दोहन का लाभ पाकिस्तान के पंजाब व सिंध को प्राप्त होता है। यह असंतोष तीन रूपों में व्यक्त होता है। प्रथम, कुछ लोग गिलगिल-बल्तिस्तान का एक प्रान्त के रूप में मान्यता का माँग करते हैं ताकि पाकिस्तान के संसद में इनका प्रतिनिधित्व हो सके और नागरिकों के अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हो सके। दूसरा, यहाँ पर स्वतंत्र गिलगिल-बल्तिस्तान राज्य की माँग की जा रही है जिसमें बलवारिस्तान आन्दोलन महत्वपूर्ण है। तीसरा, सम्पूर्ण जम्मू-काश्मीर राज्य की माँग है जो भारतीय पृथकतावादी व ’आजाद जम्मू और काश्मीर’ (पाक अधिक्रांत जम्मू और काश्मीर) के लोग शामिल है।            
पाकिस्तान का निराधार हस्तक्षेप
’पाक अधिक्रांत जम्मू और काश्मीर’ के भूभाग का उल्लेख पाकिस्तान के किसी भी दस्तावेज में नही है। यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान का निर्माण भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 से हुआ है। यह अधिनियम पाकिस्तान के भूमि का विवरण इस प्रकार देता है-
  • वह क्षेत्र जो नियुक्ति दिवस के अवसर पर पूर्वी बंगाल प्रान्त और पष्चिमी पंजाब प्रान्त
  • वह क्षेत्र सिंध प्रान्त और मुख्य आयुक्त प्रान्त ब्रिटिश बलूचिस्तान
  • उत्तरी पश्चिमी सीमाप्रान्त जो गर्वनर-जनरल द्वारा घोशित किया गया है।
पाकिस्तान के संविधान 1956, 1962, और 1973 में कहीं भी  ’पाक अधिक्रांत जम्मू और काश्मीर’ का वर्णन नहीं हैं। वर्तमान में पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 1 में जो भू-भाग वर्णित है वह है-
  • पाकिस्तान एक संघीय गणतंत्र होगा जिसे इस्लामिक गणतंत्र पाकिस्तान के नाम से जाना जायेगा,
  • पाकिस्तान के भूभाग क्षेत्र में षामिल होगा-
  • बलुचिस्तान, खैबर पक्खतूनवाला, पंजाब और सिंध
  • इस्लामाबाद की राजधानी क्षेत्र जिसे अब संघीय राजधानी से जाना जायेगा।
  • संघ द्वारा प्रषासित जनजातीय क्षेत्र एरिया
  • अन्य राज्य और क्षेत्र जो पाकिस्तान में अधिग्रहण अन्य माध्यम से
इस प्रकार कहीं भी पाकिस्तान के संविधान में ’पाक अधिक्रांत जम्मू और काश्मीर’ का वर्णन नहीं है। इस भूभाग पर पाकिस्तान का कोई वैधानिक या संवैधानिक दावा नहीं है। इस प्रकार पाक ने अधिक्रांत के माध्यम से जम्मू और काश्मीर के भूभाग को कब्जा कर रखा है। ’पाक अधिक्रांत जम्मू और काश्मीर’ के निवासियों को पाकिस्तान की नागरिकता लेने के लिए वही पद्वति अपनानी पड़ती है, जो किसी अन्य विदषी नागरिक को। यह बात भी सिद्व करता है कि यह भूभाग पाकिस्तान का नहीं है।
भारत की प्रतिक्रिया
भारत ने अपने प्रतिक्रिया में कहा कि सम्पूर्ण जम्मू और काश्मीर ’पाक अधिक्रांत जम्मू और काश्मीर’ सहित भारत का अविभिन्न अंग है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कहा ’’भारत की स्थिति बिल्कुल स्पश्ट है। सम्पूर्ण जम्मू और काश्मीर ’पाक अधिक्रांत जम्मू और काश्मीर’ सहित भारत का अविभिन्न अंग है। ’पाक अधिक्रांत जम्मू और काश्मीर’ में संसाधनों का दोहन और आर्थिक परियोजनाओं को लेकर भारत की चिन्ताएं सबको ज्ञात है जिसे सभी देषों व संगठनों से साॅझा किया गया है।
भारतीय संविधान के अनुसूची 1 में 15वें स्थान पर जम्मू-काश्मीर का नाम आता है। जम्मू-काश्मीर का भू-क्षेत्र दर्षाते हुए यह कहता है कि यह ’वह राज्यक्षेत्र जो इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले जम्मू-काश्मीर राज्य में समाविश्ट था।’ अर्थात जम्मू-काश्मीर प्रान्त में वह भूमि शामिल है जो महराजा के विलय के समय उनके राज्य में था। इसमें जम्मू, काश्मीर, लददाख व गिलगित सीमान्त इलाका का क्षेत्र शामिल है।
सामरिक महत्व व चीन की उपस्थिति
तत्कालिक हलचल भी सामरिक कारणों से ही है क्योंकि इस भू-भाग से ’चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा’ का निर्माण होना है। लगभग 46 बिलियन यूएस डालर का निवेश है। इस मार्ग के तैयार हो जाने से चीन खाड़ी क्षेत्र से आसानी से जुड़ जायेगा। चीन का यह पता है कि यह क्षेत्र भारत-पाकिस्तान का विवादित क्षेत्र है। इस स्थिति में चीन अपने निवेश को सुरक्षित रखना चाहता है। शीतयुद्ध की राजनीति ने जम्मू और काश्मीर में साम्राज्यवादी ताकतों के प्रत्यक्ष हित थे। स्वतंत्र भारत से साम्राज्यवादी ताकतों से अपना हित साधना आसान नहीं था। इसलिए एक सुरक्षित क्षेत्र की आवश्यकता थी जहाँ पर पष्चिमी महाशक्तियां अपने हित को सुरक्षित कर सके। इस खेल को आज चीन के द्वारा खेला जा रहा है।
इस क्षेत्र में विदेशी ताकतों के उपस्थिति से विषय भारत और पाकिस्तान के विवाद से निकलकर अन्य कारक भी शामिल हो गए हैं। पाकिस्तान द्वारा चीन को 5130 वर्ग किमी भूमि 1963 ई. की संधि के अनुसार छोड़ने और 42685 वर्ग किमी चीन के पास होने से इसका विषेश महत्व है।  विशेषकर चीन का आर्थिक निवेश भारत के लिए चिंता का विशय है।
चीन की उपस्थिति उसकी आर्थिक संसाधनों की माँग और रणनीतिक विस्तार के संदर्भ में समझना है। उसको सुचार रूप से चीनी अर्थव्यवस्था को लपलब्ध कराने सबसे कारण है। दूसरा, इस भारत को रणनीतिक परिसीमन के दृश्टि से भी देखा जा सकता है। चीन का इस क्षेत्र में भारी मात्रा में निवेश है। चीन पाकिस्तान से काराकोरम के माध्यम से जुड़ गया है। इस मार्ग का निर्माण 1978 ई. में हुआ था। 1280 किमी. लम्बे मार्ग का लगभग 580 किमी. काराकोरम मार्ग गिलगित-बल्तिस्तान से होकर जाता है। इसके अतिरिक्त जगलोट-स्कर्दु मार्ग का चैड़ा किया जा रहा है।
नीलम-झेलम जलशक्ति परियोजना सबसे महत्वपूर्ण है। इससे 969 मेगावाट विद्युत का उत्पाद करना है। कोहला जलविद्युत परियोजना से 1100 मेगावाट विद्युत का उत्पादन करना है। चाकोठी-हटिया केन्द्र से 500 मेगावाट विद्युत की योजना है। गोमल जाम, और मंगला बाॅध के उचाई बढाने में चीन की प्रमुख भूमिका है। ’पाक अधिक्रांत जम्मू काश्मीर’ के पूर्व प्रधानमंत्री व विपक्ष के नेता रजा फारूक के अनुसार लगभग 3000 हजार चीनी कर्मचारी उस क्षेत्र में कार्यरत है। चीन अपने आर्थिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए अपने सैनिकों की तैनाती कर रखी है। विभिन्न सूचनाओं के आधार पर यह संख्या 7000 से 10000 हजार तक बताई जाती है। वहां के निवासियों का चीन की उपस्थिति को लेकर भारी असंतोष है।
भारत का सांकेतिक विरोध
भारतीय संसद ने 22 फरवरी 1994 ई. को सर्वसम्मति से यह संकल्प प्रस्ताव पारित किया है कि भारत की एकता, प्रभुसत्ता और अखण्ड़ता के विरूद्ध हर तरह के शडयंत्रों का प्रतिरोध करने की ईच्छा और क्षमता भारत में है और पाकिस्तान को भारत के राज्य जम्मू और काश्मीर के सभी क्षेत्र को खाली कर देना चाहिए जिन्हे आक्रमण कर हथिया लिया है।
यह भू-भाग भारत की ओर से उपेक्षा का शिकार रहा है। बल्तिस्तान आंदोलन के नेतृत्वकर्ता सियांग सेरिंग कहते है कि हम लोग ’बिसरे भूमि के बिसरे लोग’ हैं। पाकिस्तान इन नागरिकों पर दमन और षड़यंत्र के माध्यम से जनानिकी बदल रहा है। नागरिको का शोषण हो रहा है। अपने उपनिवेश के रूप में विकसित कर रहा है। भारत इस विषय का प्रभावी संज्ञान और निर्णात्मक निदान नहीं खोज पा रहा है।
 २ ) बलूचिस्तान का मुद्दा                                                                                                                                 पाकिस्तान में तालिबान के साथ होने वाली बातचीत पिछले दिनों अख़बारों की सुर्ख़ियों में रही और इसने नेताओं और राजनयिकों का ध्यान आकर्षित किया. दूसरी ओर अगर थोड़ा सा भी ध्यान दिया जाए तो पाकिस्तान के इतिहास का सबसे पुराना गृह युद्ध बातचीत से ख़त्म हो सकता है. 
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में ख़ुज़दार के पास तूतक गांव में 17 जनवरी को एक सामूहिक क़ब्र से 13 शव बरामद किए गए थे. विकृत हो चुके इन शवों में से केवल दो की ही पहचान हो पाई. ये दोनों व्यक्ति चार महीने पहले ग़ायब हो गए थे.
'डॉन' अख़बार के पत्रकार शहर बलूच ने सामूहिक क़ब्र से संबंधित अपनी ख़बर में एक अधिकारी के हवाले से बताया कि वहां और भी शव ढूंढे जाने का इंतज़ार कर रहे हैं.

'पकड़ो और गाड़ो'

द फ़्रंटीयर कोर, शिया विरोधी समूह लश्कर-ए-झांगवी और अन्य गुट एक दशक पुराने 'पकड़ो और गाड़ दो' अभियान में आज भी उलझे हुए हैं. इस अभियान के तहत बलूचिस्तान मूल के लोगों, चरमपंथियों और यहां तक कि तमाशबीनों को भी अगवा कर, उन्हें ग़ायब कर दिया जाता है. उन्हें यातना दी जाती है और बाद में उनकी हत्या कर दी जाती है.
सेना, अर्धसैनिक बल और सरकार हमेशा से बलूचिस्तान में हिंसा के लिए ज़िम्मेदार होने से इनकार करते रहे हैं. इसके लिए वो इस इलाक़े में सक्रिय हथियारबंद समूहों को ज़िम्मेदार ठहराते रहे हैं.
इस तरह ग़ायब हो रहे लोगों के कुछ मामलों को पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथ में लिया है. इसके बावजूद प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की सरकार इस मुद्दे से जुड़ पाने में असफल रही है.
इस तरह ग़ायब होने वाले लोगों की संख्या कुछ सौ से लेकर हज़ारों तक में है. लेकिन कोई यह नहीं जानता है कि अब तक कितने लोग ग़ायब हुए हैं.
ग़ायब हुए लोगों के परिजन सरकार के पास अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए सर्दियों के इस मौसम में भी कराची से इस्लामाबाद तक की पदयात्रा पर हैं.
बलूचिस्तान पाकिस्तान से आजादी की जंग लड़ रहा है और पाकिस्तान का आरोप है कि भारत बलूचिस्तान में अलगाववादियों की मदद करता है. बलूचिस्तान के राष्ट्रवादी गुट बलूचिस्तान लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन के नेता नवाबजादा मर्री ने भारतीय अखबार द हिन्दू को दिए बयान में कहा, "हम चाहते हैं कि सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की बलूचिस्तान पर साफ पॉलिसी हो.                                            मर्री ने भारत से साफ समर्थन की मांग करते हुए कहा, "अगर पाकिस्तानी अधिकारी खुले तौर पर कश्मीरी अलगाववादी नेताओं से मिल सकते हैं तो भारत को ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए? हमारे बार बार गिड़गिड़ाने पर भी रेड क्रॉस का ध्यान बलूचिस्तान पर नहीं है. रेडक्रॉस के साथ हॉटलाइन शुरू करने के लिए हम भारत की मदद चाहते हैं."
उन्होंने कहा, "बलूचिस्तान तीन देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान के बीच बंटा हुआ है. लेकिन पाकिस्तान में बलूच लोगों के खिलाफ 2004 से अब तक पांच मिलिटरी ऑपरेशनों में 19,000 लोग मारे जा चुके हैं और बड़ी संख्या में लापता और विस्थापित हुए हैं. उनका आरोप है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान में भी बलूचों को तालिबान के हाथों पीड़ित होने को प्रोत्साहित करता है."                            

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