सिनेमा का आकर्षण एक ज़माने में जादुई था। मुझे तो उसने संवेदनात्मक रूप से समृद्धि ही दी है।पता नहीं क्या होता है, सिनेमा में, छुटपन में सुना करते थे कि बहुत सारे घर बरबाद कर देता है. बच्चों का मन तो बरबाद करता ही है.
जीवन में इतने धक्के खाने के बाद अब भी ‘आनन्द’ के राजेश खन्ना को देखकर मन भावुक होने लगता है, जबकि बहुत संभावना है स्वयं राजेश खन्ना भी अब खुद को देखकर भावुक न होते होंगे.
सिनेमा सोचते ही ‘गाइड’ के पीलापन लिए उस पोस्टर का ख़याल आता जिसमें देवानंद के बंधे हाथों वहीदा रहमान का सिर गिरा हुआ है, और वह प्यार की आपसी समझदारी का चरम लगती, इतना अतिंद्रीय कि मन डूबता सा लगे. डूबकर फिर धीमे गुनगुनाने लगे, ‘लाख मना ले दुनिया, साथ न ये छूटेगा, आके मेरे हाथों में, हाथ न ये छूटेगा, ओ मेरे जीवनसाथी, तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं..’ कितने तो रंग होते सिनेमा के. इतने कि बचपन के हाथों पकड़ में न आते. ‘जुएलथीफ़’ का वह सीन याद आता है? भरी महफ़िल में अशोक कुमार हल्ला मचाते कि झूठ बोलता है ये आदमी, नहीं बोल रहा तो सबके सामने दिखाए कि इसके पैर में छह उंगलियां नहीं हैं? फिर देवानंद दिखाने को धीमे-धीमे अपने जूते की तस्में खोलते, फिर मोज़े पर हाथ जाता, देवानंद का टेंस चेहरा दिखता, महफ़िल के लोगों के रियेक्शन शॉट्स, अशोक कुमार की तनी भौंहें, फिर कैमरा मोज़े पर, धीमे-धीमे नीचे को सरकता, आह, उस तनावबिंधे कसी कटिंग में लगता देवानंद के पैर में पता नहीं कितनी उंगलियां होंगी मगर हम देखनेवालों का हार्ट फेल ज़रूर हो जाएगा! जैसे ‘तीसरी कसम’ के क्लाइमैक्स में वहीदा के रेल पर चढ़ने और हीरामन के उस मार्मिक क्षण ऐन मौके न पहुंच पाने के खौफ़ में कलेजा लपकता मुंह को आता. एक टीस छूटी रह जाती मन में और फिर कितने-कितने दिन मन के भीतर एक गांठ खोलती और बांधती रहती. फिर ‘पाक़ीज़ा’ का वह दृश्य.. कौन दृश्य.. आदमी कितने दृश्यों की बात करे? और बात करने के बाद भी कह पाएगा जिसकी उसने सिनेमाघर के अंधेरों में उन क्षणों अनुभूति की? ठाड़े रहियो ओ बांके यार, कहां, चैन से ठाड़े रहने की कोई जगह बची है इस दुनिया में?
सिनेमा सोचते ही ‘गाइड’ के पीलापन लिए उस पोस्टर का ख़याल आता जिसमें देवानंद के बंधे हाथों वहीदा रहमान का सिर गिरा हुआ है, और वह प्यार की आपसी समझदारी का चरम लगती, इतना अतिंद्रीय कि मन डूबता सा लगे. डूबकर फिर धीमे गुनगुनाने लगे, ‘लाख मना ले दुनिया, साथ न ये छूटेगा, आके मेरे हाथों में, हाथ न ये छूटेगा, ओ मेरे जीवनसाथी, तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं..’ कितने तो रंग होते सिनेमा के. इतने कि बचपन के हाथों पकड़ में न आते. ‘जुएलथीफ़’ का वह सीन याद आता है? भरी महफ़िल में अशोक कुमार हल्ला मचाते कि झूठ बोलता है ये आदमी, नहीं बोल रहा तो सबके सामने दिखाए कि इसके पैर में छह उंगलियां नहीं हैं? फिर देवानंद दिखाने को धीमे-धीमे अपने जूते की तस्में खोलते, फिर मोज़े पर हाथ जाता, देवानंद का टेंस चेहरा दिखता, महफ़िल के लोगों के रियेक्शन शॉट्स, अशोक कुमार की तनी भौंहें, फिर कैमरा मोज़े पर, धीमे-धीमे नीचे को सरकता, आह, उस तनावबिंधे कसी कटिंग में लगता देवानंद के पैर में पता नहीं कितनी उंगलियां होंगी मगर हम देखनेवालों का हार्ट फेल ज़रूर हो जाएगा! जैसे ‘तीसरी कसम’ के क्लाइमैक्स में वहीदा के रेल पर चढ़ने और हीरामन के उस मार्मिक क्षण ऐन मौके न पहुंच पाने के खौफ़ में कलेजा लपकता मुंह को आता. एक टीस छूटी रह जाती मन में और फिर कितने-कितने दिन मन के भीतर एक गांठ खोलती और बांधती रहती. फिर ‘पाक़ीज़ा’ का वह दृश्य.. कौन दृश्य.. आदमी कितने दृश्यों की बात करे? और बात करने के बाद भी कह पाएगा जिसकी उसने सिनेमाघर के अंधेरों में उन क्षणों अनुभूति की? ठाड़े रहियो ओ बांके यार, कहां, चैन से ठाड़े रहने की कोई जगह बची है इस दुनिया में?
चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो.. भाग जायें? छोड़ दें सबकुछ? और उसके बाद?
पता नहीं सिनेमा क्या होता है. सचमुच.
मगर यह सब बहुत पहले के सिनेमा की बातें हैं. टीवी, डिजिटल प्लेटफॉर्म, इंटरनेट से पहले की.
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इटली के तवियानी भाइयों की 1977 की एक फ़िल्म है, ‘पादरे पदरोने’, क्रूरता और अशिक्षा की रोटी पर बड़ा हो रहा एक गड़रिया बच्चा. दरअसल किशोर. सार्दिनीया के उजाड़ मैदानों में अपने भेड़ों के पीछे, कुछ उनकी तरह ही बदहवास और अचकचाया हुआ. रास्ता भूले दो मुसाफ़िर उसी मैदान से गुजर रहे हैं. एक के हाथ में खड़खड़ाती साइकिल, दूसरा कंधे से लटकाये अपना अकॉर्डियन बजाता जा रहा है. उस बाजे के स्वर में, उस धुन में, कुछ ऐसी सम्मोहनी है कि गड़रिया किशोर तीरबींधा अपनी जगह जड़ हो जाता है. जड़ माने, जड़. कुछ पलों बाद चेतना लौटती है तो दूर सुन रहे बाजे के जादू में मंत्रमुग्ध पागलों की तरह फिर उसके पीछे भागा-भागा जाता है. अपने दर्शक को संगीत के जादू में, प्रत्यक्ष की उस इंटेंस अनुभूति में बांध लेने, बींध देने की यह अनूठी ताकत, यही है सिनेमा. जिन्होंने फ्रेंच फ़िल्मकार फ्रांसुआ त्रूफो की ‘400 ब्लोज़’ देखी है उन्हें खूब याद होगा फ़िल्म के आखिर का वह लंबा सीक्वेंस जब बच्चा आंतुआं कैद से भागकर ज़्यां कोंस्तांतिन के कभी न भूलनेवाले संगीत की संगत में समुंदर की तरफ दौड़ता है, जीवन के सब तरह के कैदों को धता बताती मुक्ति का जो वह निर्बंध, मार्मिक, आह्लादकारी ऑर्केस्ट्रेशन है वह मन के पोर-पोर खोलकर उसे आत्मा के सब सारे उमंगों में रंग देता है! यह ताक़त है सिनेमा की. और हमेशा से रही है, चार्ली चैप्लिन के दिनों से, और जब तक लोग सिनेमाघरों के अंधेरे में बैठकर फ़िल्में देखते रहेंगे तब तक रहेगी.
मगर रहेगी? क्यों रहेगी? ‘गाइड’ के राजू को रोजी़ की मोहब्बत तक न बचा सकी, फिर आज की रोज़ी तो आईपीएल के अपने स्टॉक की चिंता में रहती है, किसी राजू और राहुल के मोहब्बत को बचाने की नहीं, फिर किस मोहब्बत के आसरे सिनेमा अपने सपनों को संजोये रखने की ताक़त के सपने देखेगा? देख पाएगा? दिबाकर बनर्जी के ‘लव सैक्स और धोखा’ में कैसा भी मोहब्बत बचता है? माथे में ऐंठता गुरुदत्त के ‘प्यासा’ का पुराना गाना बजता है- ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है!
अच्छाई के दिन गए. जीवन में नहीं बचा तो फिर सिनेमा में क्या खाकर बचता. जो बचा है वह पैसा खाकर, या खाने के मोह में बचा है. बॉक्स ऑफिस के अच्छे दिनों की चिंता बची है, अच्छे दिनों की अच्छाई की कहां बची है, क्योंकि आदर्शों को तो बहुत पहले खाकर हजम कर लिया गया. और ऐसा नहीं है कि कुंदन शाह के ‘जाने भी दो यारो’ में पहली बार हुआ कि सतीश शाह केक की शक्ल में आदर्शों को खाते दीखे, तीसेक साल पहले गुरुदत्त ऑलरेडी उन आदर्शों को फुटबाल की तरह हवा में लात खाता देख गए थे. समझदार निर्माता और बेवकूफ़ दर्शक ही होता है जो मोहल्ले के लफाड़ी किसी मुन्ना भाई की झप्पियों से आश्वस्त होकर मुस्कराने लगता है, या चिरगिल्ले सरलीकरणों के इडियोटिक समाधानों का जोशीला राष्ट्रीय पर्व मनाने, ऑल इज़ वेल को राष्ट्रीय गान बनाने, बजाने लगता है.
कहने का मतलब हम सभी जानते हैं ‘ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना’ गाने का मतलब नहीं. जीवन से अच्छाई के गए दिन फिर लौट कर नहीं आते. सिनेमा के झूठ की शक्ल में भी नहीं.
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झूठ कह रहा हूं. बुरे दिनों की कहानियां अच्छे अंत के नोट पर खत्म होती ही हैं. अच्छे दिन सिनेमा की झूठ की शक्ल में लौटते ही हैं. बार-बार लौटते हैं. न लौटें तो मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा के लौटने की फिर कोई जगह न बचे. श्री 420 से शुरू होकर मिस्टर 840 तक हीरो का अच्छाई पर अंत लौटाये लिये लाना ही हिंदी फ़िल्म में समाज को संदेश है. अच्छे रुमानी भले लोगों का इंटरवल तक किसी बुरे वक़्त के दलदल में उलझ जाना, मगर फिर अंत तक अच्छे कमल-दल की तरह कीचड़ से बाहर निकल आना के झूठे सपने बेचने की ही हिंदी सिनेमा खाता है. एक लातखाये मुल्क में दर्शकों के लिए भी सहूलियत की पुरानी आदत हो गई है. कि लातखाये जीवन में शाहरुख और आमिर के न्यूयॉर्क या मुंबई की जीत को वह बिलासपुर और वैशाली के अपने मनहारे जीवन पर सुपरइंपोज़ करके किसी खोखली खुशहाली के सपनों की उम्मीद में सोये रहें. जीवन में कैसे अच्छा होगा से मुंह चुराते, सिनेमा में अच्छा हो जाएगा को गुनगुनाते सिनेमा में जागे और जीवन में उनींदे रहें.
जबकि सिनेमा, सिनेमा में सोया रहेगा. वह बुरे दिनों के इकहरे, सस्ते अंत के सपने खोज लाएगा, बुरे दिनों की समझदार पड़ताल में उतरने की कोशिश से बचेगा. उसके लिए कितने रास्तों का आख्यान बुनना, कैसी भी जटिलता में पसरना, मुश्किल होगा. क्योंकि अपनी लोकोपकारी (पढ़ें पॉपुलिस्ट) प्रकृति में वह राज खोसला के ‘दो रास्ते’ के बने-बनाये पिटे रास्ते पर चलना ज़्यादा प्रीफर करेगा, जिसमें लोग, लोग नहीं, कंस और कृष्ण के अतिवादी रंगत में होंगे. अच्छे (बलराज साहनी) और बुरे (प्रेम चोपड़ा) की दो धुरियां होंगी और नायक जो है, हमेशा अच्छे के पक्ष में खड़ा दीखेगा और फ़िल्म का अंत हमेशा ‘बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी’ के खुशहाल ठुमकों के पीछे अपने को दीप्ति दे लेगी. मतलब राय के बांग्ला ‘अरेण्येर दिन रात्री’ से परिवेश व जीवन के अंतर्संबंधों की व्याख्या तो वह नहीं ही सीखेगा, गुरुदत्त के ‘प्यासा’ की पारिवारिक और प्रेम (माला सिन्हा) की भावपूर्ण समीक्षा को भी अपनी अपनी समझ की परम्परा में जोड़ने से बचा ले जाएगा. ‘सारा आकाश’ और ‘पिया का घर’ की टीसभरी सफ़र पर निकलनेवाले बासु चटर्जी को चित चुराने और कुछ खट्टा कुछ मीठा बनानेवाले लाइट एंटरटेनर में बदल देगा. मतलब हिंदी सिनेमा में बुरे दिनों का एंटरटेनमेंट बना रहेगा, अच्छे दिनों को पहचानने की समझदारी की उसमें जगह नहीं बनेगी....मशान जैसी फिल्मों ने उम्मीद जगाई है। बीच में समानांतर सिनेमा ने भी लीक तोड़ी थी। पर अभी भी अच्छी कहानियों और कल्पनाशील निर्देशन की कमी महसूस होती है बर्गस्त्रस्म, ज्यां रेनुआं , तारकोवस्की, कुरोसावा, रे, घटक की परम्परा एक रास्ता दिखाती है, चलना तो हमें ही है( सिलेमा सीरीज-1)

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