२०१६ के सिविल सेवा परिणाम ने हिंदी भाषियों को न केवल हताश और कुंठित किया है बल्कि तंत्र और कोचिंग संस्थाओं के प्रति भी एक गहरी नाराज़गी का भाव उभर कर आया है ....सवाल अब यह है कि इस दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति को ख़त्म करने के लिए कोचिंग व्यवस्था और हिंदी पट्टी के पास कौन से विकल्प हैं , जिसे आज़मा कर हिंदी भाषी लोग अपना यथोचित स्थान पा सकते हैं ...१)..कोचिंग्स को चाहिए कि वे अपने यहाँ एक परमानेंट एक्सरसाइज एंड गाइडेंस प्रोग्राम चलायें ...इनसे जुड़े बच्चों को टेस्ट द्वारा छांटकर लगातार विशेष निगरानी में रखकर प्रशिक्षित किया जाये .....२) कोचिंग के क्लास रूम कार्यक्रम में एकतरफा लेक्चर प्रणाली की जगह पर संवाद युक्त प्रणाली को धीरे -२ लोकप्रिय और लागू किया जाये ...... ३) एक सतत संवाद कार्यक्रम चलाया जाये जिसमे हर १५ दिन पर क्विज , सेमिनार , GD,डिबेट, टापर्स मीट.... आदि का आयोजन होता रहे .........4) हर कोचिंग अपने छात्रों का मोराल बूस्ट अप करने के लिए टेस्ट न कराये बल्कि उनकी वास्तविक स्थिति को दर्शाने वाले टेस्ट हों , आतंरिक और वाह्य दोनों तरह की टेस्ट सीरिज का उच्च स्तरीय होना परिणाम प्राप्त करने हेतु बेहद अहम है ...... 5) छात्रों की रचनात्मकता बढ़ाने हेतु वाल मैगजीन एक प्रभावी माध्यम बन सकती है ... ६) बड़ी से बड़ी हिंदी माध्यम कोचिंग के पास अच्छी लाइब्रेरी का अभाव चौकाने वाला है ..यह स्वाध्याय और कोचिंग - छात्र सहभागिता दोनों के अभाव को प्रदर्शित करता है , कोचिंग इसे प्रोफेशनल ढंग से भी चला सकती हैं कैंटीन आदि की सुविधा सहित , आखिरकार बाहर बच्चे लाइब्रेरी संस्कृति से जुड़े ही हुए हैं तो कोचिंग को हाथ आजमाने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए .... ७ ) हर कोचिंग की अपनी वेबसाइट भी है जो प्रभावशाली नहीं हैं , उनपर भी कोचिंग्स को और परिश्रम करना चाहिए .......................... छात्रों को भी अपनी पढाई का ढांचा बदलना होगा ...१) उन्हें अपने कंटेंट लेबल को ज्यादा विविध और स्तरीय बनाना ही होगा , उस स्तर का जिस स्तर पर UPSC के परीक्षक सोचते और पढ़ते हैं ...................२) यह परीक्षा अत्यधिक अभ्यास पर निर्भर है , ऐन परीक्षा के पहले पढ़कर सबसे पहला जवाब परीक्षा हॉल में लिखना आत्म घाती है ...उत्तर लेखन का निरंतर अभ्यास ही सफलता की गारंटी दे सकता है ... ३) अच्छे ग्रुप का निर्माण भी एक परिवर्तनकारी कदम हो सकता है .......................4 ) कॉपी -बुक स्टाइल की पढाई का ज़माना हमेशा रहेगा पर UPSC में नवोन्मेष की नयी मांग हेतु स्वाध्याय के क्षेत्र को विस्तृत करना एक अनिवार्य जरुरत है हिंदी पट्टी हेतु ....... 5 ) इंटरनेट का समुचित प्रयोग करके कैसे हम हिंदी भाषी होने और न होने के बीच के अंतर को पाटने पर काम करें , यह एक मौजू प्रश्न है .............................६) आम तौर हिंदी भाषी लोग क्षेत्रीय पीसीएस भी देते हैं जिसका स्तर और प्रकृति दोनों UPSC से भिन्न होती है , पर अक्सर हिंदी पट्टी का प्रतियोगी पीसीएस स्तर के उत्तर UPSC में भी लिखकर आते हैं ... यह उनकी असफलता के बड़े कारणों में से एक है ..... ७ ) नियमित डायरी लेखन तथा प्रतिदिन अपने मन से लिखने की आदत सफलता के करीब ले जाती है , इसे तुरंत दिनचर्या में शामिल करें ..... ८ ) हिंदी भाषियों को शुरू से द्विभाषी होने पर जोर देना ही होगा ..................९ ) रुचियों में विविधता पैदा करें ...दुनिया की नियामतों से जुड़ें , स्वस्थ जीवन शैली अपनाएं .... उपरोक्त तरीके अपनाएं , अपनी कोचिंग संस्थाओं से सुधारों की तरफ प्रवित्त होने का अनुरोध करें .... सफलता बस आपके सही प्रयास के इंतजार में है ...........................शुभकामनाएं!

good analysis with right direction
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