Thursday, 9 June 2016

सिनेमा की कहानी -१

सिनेमा का आकर्षण एक ज़माने में जादुई था। मुझे तो उसने संवेदनात्मक रूप से समृद्धि ही दी है।पता नहीं क्‍या होता है, सिनेमा में, छुटपन में सुना करते थे कि बहुत सारे घर बरबाद कर देता है. बच्‍चों का मन तो बरबाद करता ही है.
जीवन में इतने धक्‍के खाने के बाद अब भी ‘आनन्‍द’ के राजेश खन्‍ना को देखकर मन भावुक होने लगता है, जबकि बहुत संभावना है स्‍वयं राजेश खन्‍ना भी अब खुद को देखकर भावुक न होते होंगे.
सिनेमा सोचते ही ‘गाइड’ के पीलापन लिए उस पोस्‍टर का ख़याल आता जिसमें देवानंद के बंधे हाथों वहीदा रहमान का सिर गिरा हुआ है, और वह प्‍यार की आपसी समझदारी का चरम लगती, इतना अतिंद्रीय कि मन डूबता सा लगे. डूबकर फिर धीमे गुनगुनाने लगे, ‘लाख मना ले दुनिया, साथ न ये छूटेगा, आके मेरे हाथों में, हाथ न ये छूटेगा, ओ मेरे जीवनसाथी, तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं..’ कितने तो रंग होते सिनेमा के. इतने कि बचपन के हाथों पकड़ में न आते. ‘जुएलथीफ़’ का वह सीन याद आता है? भरी महफ़ि‍ल में अशोक कुमार हल्‍ला मचाते कि झूठ बोलता है ये आदमी, नहीं बोल रहा तो सबके सामने दिखाए कि इसके पैर में छह उंगलियां नहीं हैं? फिर देवानंद दिखाने को धीमे-धीमे अपने जूते की तस्‍में खोलते, फिर मोज़े पर हाथ जाता, देवानंद का टेंस चेहरा दिखता, महफ़ि‍ल के लोगों के रियेक्‍शन शॉट्स, अशोक कुमार की तनी भौंहें, फिर कैमरा मोज़े पर, धीमे-धीमे नीचे को सरकता, आह, उस तनावबिंधे कसी कटिंग में लगता देवानंद के पैर में पता नहीं कितनी उंगलियां होंगी मगर हम देखनेवालों का हार्ट फेल ज़रूर हो जाएगा! जैसे ‘तीसरी कसम’ के क्‍लाइमैक्‍स में वहीदा के रेल पर चढ़ने और हीरामन के उस मार्मिक क्षण ऐन मौके न पहुंच पाने के खौफ़ में कलेजा लपकता मुंह को आता. एक टीस छूटी रह जाती मन में और फिर कितने-कितने दिन मन के भीतर एक गांठ खोलती और बांधती रहती. फिर ‘पाक़ीज़ा’ का वह दृश्‍य.. कौन दृश्‍य.. आदमी कितने दृश्‍यों की बात करे? और बात करने के बाद भी कह पाएगा जिसकी उसने सिनेमाघर के अंधेरों में उन क्षणों अनुभूति की? ठाड़े रहियो ओ बांके यार, कहां, चैन से ठाड़े रहने की कोई जगह बची है इस दुनिया में?
चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो.. भाग जायें? छोड़ दें सबकुछ? और उसके बाद?
पता नहीं सिनेमा क्‍या होता है. सचमुच.
मगर यह सब बहुत पहले के सिनेमा की बातें हैं. टीवी, डिजिटल प्‍लेटफॉर्म, इंटरनेट से पहले की.
***
इटली के तवियानी भाइयों की 1977 की एक फ़ि‍ल्‍म है, ‘पादरे पदरोने’, क्रूरता और अशिक्षा की रोटी पर बड़ा हो रहा एक गड़रिया बच्‍चा. दरअसल किशोर. सार्दिनीया के उजाड़ मैदानों में अपने भेड़ों के पीछे, कुछ उनकी तरह ही बदहवास और अचकचाया हुआ. रास्‍ता भूले दो मुसाफ़ि‍र उसी मैदान से गुजर रहे हैं. एक के हाथ में खड़खड़ाती साइकिल, दूसरा कंधे से लटकाये अपना अकॉर्डियन बजाता जा रहा है. उस बाजे के स्‍वर में, उस धुन में, कुछ ऐसी सम्‍मोहनी है कि गड़रिया किशोर तीरबींधा अपनी जगह जड़ हो जाता है. जड़ माने, जड़. कुछ पलों बाद चेतना लौटती है तो दूर सुन रहे बाजे के जादू में मंत्रमुग्‍ध पागलों की तरह फिर उसके पीछे भागा-भागा जाता है. अपने दर्शक को संगीत के जादू में, प्रत्‍यक्ष की उस इंटेंस अनुभूति में बांध लेने, बींध देने की यह अनूठी ताकत, यही है सिनेमा. जिन्‍होंने फ्रेंच फ़ि‍ल्‍मकार फ्रांसुआ त्रूफो की ‘400 ब्‍लोज़’ देखी है उन्‍हें खूब याद होगा फ़ि‍ल्‍म के आखिर का वह लंबा सीक्‍वेंस जब बच्‍चा आंतुआं कैद से भागकर ज़्यां कोंस्‍तांतिन के कभी न भूलनेवाले संगीत की संगत में समुंदर की तरफ दौड़ता है, जीवन के सब तरह के कैदों को धता बताती मुक्ति का जो वह निर्बंध, मार्मिक, आह्लादकारी ऑर्केस्‍ट्रेशन है वह मन के पोर-पोर खोलकर उसे आत्‍मा के सब सारे उमंगों में रंग देता है! यह ताक़त है सिनेमा की. और हमेशा से रही है, चार्ली चैप्लिन के दिनों से, और जब तक लोग सिनेमाघरों के अंधेरे में बैठकर फ़ि‍ल्‍में देखते रहेंगे तब तक रहेगी.
मगर रहेगी? क्‍यों रहेगी? ‘गाइड’ के राजू को रोजी़ की मोहब्‍बत तक न बचा सकी, फिर आज की रोज़ी तो आईपीएल के अपने स्‍टॉक की चिंता में रहती है, किसी राजू और राहुल के मोहब्‍बत को बचाने की नहीं, फिर किस मोहब्‍बत के आसरे सिनेमा अपने सपनों को संजोये रखने की ताक़त के सपने देखेगा? देख पाएगा? दिबाकर बनर्जी के ‘लव सैक्‍स और धोखा’ में कैसा भी मोहब्‍बत बचता है? माथे में ऐंठता गुरुदत्‍त के ‘प्‍यासा’ का पुराना गाना बजता है- ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्‍या है!
अच्‍छाई के दिन गए. जीवन में नहीं बचा तो फिर सिनेमा में क्‍या खाकर बचता. जो बचा है वह पैसा खाकर, या खाने के मोह में बचा है. बॉक्‍स ऑफिस के अच्‍छे दिनों की चिंता बची है, अच्‍छे दिनों की अच्‍छाई की कहां बची है, क्‍योंकि आदर्शों को तो बहुत पहले खाकर हजम कर लिया गया. और ऐसा नहीं है कि कुंदन शाह के ‘जाने भी दो यारो’ में पहली बार हुआ कि सतीश शाह केक की शक्‍ल में आदर्शों को खाते दीखे, तीसेक साल पहले गुरुदत्‍त ऑलरेडी उन आदर्शों को फुटबाल की तरह हवा में लात खाता देख गए थे. समझदार निर्माता और बेवकूफ़ दर्शक ही होता है जो मोहल्‍ले के लफाड़ी किसी मुन्‍ना भाई की झप्पियों से आश्‍वस्‍त होकर मुस्‍कराने लगता है, या चिरगिल्‍ले सरलीकरणों के इडियोटिक समाधानों का जोशीला राष्‍ट्रीय पर्व मनाने, ऑल इज़ वेल को राष्‍ट्रीय गान बनाने, बजाने लगता है.
कहने का मतलब हम सभी जानते हैं ‘ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना’ गाने का मतलब नहीं. जीवन से अच्‍छाई के गए दिन फिर लौट कर नहीं आते. सिनेमा के झूठ की शक्‍ल में भी नहीं.
***
झूठ कह रहा हूं. बुरे दिनों की कहानियां अच्‍छे अंत के नोट पर खत्‍म होती ही हैं. अच्‍छे दिन सिनेमा की झूठ की शक्‍ल में लौटते ही हैं. बार-बार लौटते हैं. न लौटें तो मुख्‍यधारा के हिंदी सिनेमा के लौटने की फिर कोई जगह न बचे. श्री 420 से शुरू होकर मिस्‍टर 840 तक हीरो का अच्‍छाई पर अंत लौटाये लिये लाना ही हिंदी फ़ि‍ल्‍म में समाज को संदेश है. अच्‍छे रुमानी भले लोगों का इंटरवल तक किसी बुरे वक़्त के दलदल में उलझ जाना, मगर फिर अंत तक अच्‍छे कमल-दल की तरह कीचड़ से बाहर निकल आना के झूठे सपने बेचने की ही हिंदी सिनेमा खाता है. एक लातखाये मुल्‍क में दर्शकों के लिए भी सहूलियत की पुरानी आदत हो गई है. कि लातखाये जीवन में शाहरुख और आमिर के न्‍यूयॉर्क या मुंबई की जीत को वह बिलासपुर और वैशाली के अपने मनहारे जीवन पर सुपरइंपोज़ करके किसी खोखली खुशहाली के सपनों की उम्‍मीद में सोये रहें. जीवन में कैसे अच्‍छा होगा से मुंह चुराते, सिनेमा में अच्‍छा हो जाएगा को गुनगुनाते सिनेमा में जागे और जीवन में उनींदे रहें.
जबकि सिनेमा, सिनेमा में सोया रहेगा. वह बुरे दिनों के इकहरे, सस्‍ते अंत के सपने खोज लाएगा, बुरे दिनों की समझदार पड़ताल में उतरने की कोशिश से बचेगा. उसके लिए कितने रास्‍तों का आख्‍यान बुनना, कैसी भी जटिलता में पसरना, मुश्किल होगा. क्‍योंकि अपनी लोकोपकारी (पढ़ें पॉपुलिस्‍ट) प्रकृति में वह राज खोसला के ‘दो रास्‍ते’ के बने-बनाये पिटे रास्‍ते पर चलना ज़्यादा प्रीफर करेगा, जिसमें लोग, लोग नहीं, कंस और कृष्‍ण के अतिवादी रंगत में होंगे. अच्‍छे (बलराज साहनी) और बुरे (प्रेम चोपड़ा) की दो धुरियां होंगी और नायक जो है, हमेशा अच्‍छे के पक्ष में खड़ा दीखेगा और फ़ि‍ल्‍म का अंत हमेशा ‘बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी’ के खुशहाल ठुमकों के पीछे अपने को दीप्ति दे लेगी. मतलब राय के बांग्‍ला ‘अरेण्‍येर दिन रात्री’ से परिवेश व जीवन के अंतर्संबंधों की व्‍याख्‍या तो वह नहीं ही सीखेगा, गुरुदत्‍त के ‘प्‍यासा’ की पारिवारिक और प्रेम (माला सिन्‍हा) की भावपूर्ण समीक्षा को भी अपनी अपनी समझ की परम्‍परा में जोड़ने से बचा ले जाएगा. ‘सारा आकाश’ और ‘पिया का घर’ की टीसभरी सफ़र पर निकलनेवाले बासु चटर्जी को चित चुराने और कुछ खट्टा कुछ मीठा बनानेवाले लाइट एंटरटेनर में बदल देगा. मतलब हिंदी सिनेमा में बुरे दिनों का एंटरटेनमेंट बना रहेगा, अच्‍छे दिनों को पहचानने की समझदारी की उसमें जगह नहीं बनेगी....मशान जैसी फिल्मों ने उम्मीद जगाई है। बीच में समानांतर सिनेमा ने भी लीक तोड़ी थी। पर अभी भी अच्छी कहानियों और कल्पनाशील निर्देशन की कमी महसूस होती है बर्गस्त्रस्म, ज्यां रेनुआं , तारकोवस्की, कुरोसावा, रे, घटक की परम्परा एक रास्ता दिखाती है, चलना तो हमें ही है( सिलेमा सीरीज-1)

Friday, 3 June 2016

भारत एक पुनर्खोज -१

ईस्ट इंडिया कंपनी के एक शुरुआती अधिकारी जॉर्ज लिंड्से जॉनस्टोन ने 1801 में लंदन में संसद में बहुत गहरी बात कही थी कि भारत में ब्रिटेन का साम्राज्य सोच का साम्राज्य है और यह अपनी शक्ति को पहचानने से भारतवासियों के इनकार की बुनियाद पर खड़ा है. अपनी ताकत को पहचानने में आम भारतीयों की आनाकानी जॉनस्टोन के जमाने में ब्रिटिश हुकूमत के सामने भारत की गुलामी जारी रहने की प्रमुख वजह थी. कुछ हद तक भारत के राजनैतिक हालात की वजह से यह आज भी सच है कि सुविधाविहीन भारतीय जागृत होने और खुद को इस असाधारण वंचना से तेजी से और हमेशा के लिए मुक्त किए जाने की मांग करने में हिचकते हैं. तथाकथित आम आदमी कहलाने वाले, सबसे संपन्न न सही फिर भी अपेक्षाकृत संपन्न लोगों की शिकायतें जोरदार ढंग से उछाली जाती हैं. इसके विपरीत भारतीय समाज में वास्तविक कमजोर वर्गों की लंबे समय से जारी जबरदस्त वंचना पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है.
इस सबके बावजूद भारत की लोकतांत्रिक राजनीति सबसे वंचित देशवासियों को अपनी शक्ति को पहचानने और यह मांग करने के अवसर देती है कि देश की इतनी विशाल आबादी का जीवन बर्बाद करने वाली बेहद अहम असमानताओं को जल्दी से जल्दी दूर किया जाए.....तो क्या आज़ादी के सत्तरवें साल में भी यह प्रवित्ति बदली है ?.....अथवा हम यूँ ही रह गए हैं ?...ऐसा नहीं है कि कुछ भी नहीं बदला है...पर भारतीय अपने सहज संकोची भलमनसाहत की वजह से हर जगह धीमे और ढीले हैं....वीरेन डंगवाल तो संकेत भी कर रहे हैं इसी प्रवित्ति पर-
इतने भले नहीं बन जाना साथी जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कुव्वत सारी प्रतिभा किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया?
इतने दुर्गम मत बन जाना सम्भव ही रह जाय न तुम तक कोई राह बनाना अपने ऊंचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना
इतने चालू मत हो जाना सुन-सुन कर हरक़ते तुम्हारी पड़े हमें शरमाना बग़ल दबी हो बोतल मुँह में जनता का अफसाना ऐसे घाघ नहीं हो जाना
ऐसे कठमुल्ले मत बनना बात नहीं हो मन की तो बस तन जाना दुनिया देख चुके हो यारो एक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव कठमुल्लापन छोड़ो उस पर भी तो तनिक विचारो
काफ़ी बुरा समय है साथी गरज रहे हैं घन घमण्ड के नभ की फटती है छाती अंधकार की सत्ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती इनकी असल समझना साथी अपनी समझ बदलना साथी
ऐसा क्यों है कि यह समाज बदहाल स्थिति में जी रहा है? कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं दिखती जैसे कि लोग चुक गए हों?इसका एक बहुत बड़ा कारण है हमारे भीतर यथास्थिति को स्वीकार करने कि प्रवृति का आना. यह परिवर्तन बहुत मायने रखता है. इसी कारण विरोध या संघर्ष आज चेतना के स्तर पर न होकर पावर के स्तर पर होने लगा है. परिवर्तन की आकांक्षा अगर ‘सत्ता’ के लिए हो, ‘पावर’ के लिए हो तो जिस तरह का नैतिक आंदोलन जयप्रकाश जी या गांधी जी ने किया था, नामुमकिन हो जाता है. यहां तो स्थिति आज यह है कि जिस चीज या कि मुद्दे को उठाओ उसे अपने सत्ता में आने कि प्रक्रिया को तेज करने का साधन भर समझ लो. जनता के हित की बात यहां नहीं होती. हर कमी, हर न्यूनता को यहां वैयक्तिक और निजी स्वार्थ के हित में कैश करवाया जाता है. हम-आप सभी जब निज पर केन्द्रित हो चलेंगे तो कहां की और कैसी सुगबुगाहट?
यह समय, दुर्भाग्य से बिखरने-टूटने-बंटने का कुसमय होता जा रहा है. ऐसी शक्तियां जो अपने मूल में, भारतीय परपंरा की नासमझी, बुद्धिहीन विरोध से, संकीर्ण देशप्रेम से, भारतीय लोकतंत्र की छूटों और कमज़ोरियों का दुरुपयोग करते हुए पनपी हैं, हिंसक-आक्रामक-हत्यारी हो रही हैं. छिछली धार्मिकता, उथला अध्यात्म, सतही आधुनिकता आदि का एक विचित्र अबूझ गड्डमड्ड उस भारत को तोड़ने में सक्रिय हो गया है जो सदियों से, समझ और जतन से, अद्वितीय समावेश और पारस्परिकता से, अदम्य बहुलता और बौद्धिक-नैतिक दार्शनिक वाद-विवाद-संवाद से रचाया-बसाया गया था और अब तक, सारे विचलनों और विभ्रमों के बावजूद, सक्रिय और जीवित है
इस भारत को कोई कट्टरता, कोई असहिष्णुता कोई देशप्रेम या देशद्रोह आसानी से नष्ट नहीं कर सकता, भले उसके पास संख्या, बाहु, शस्त्र या आतंक का कितना ही बल क्यों न हो. इसे याद रखने की ज़रूरत है. पर यह याद करने की भी कि इसलिए जो हो रहा है उसके प्रतिरोध को अनेक स्तरीय, सशक्त और सकर्मक बनाने का प्रयत्न होना चाहिए पर वह सिर्फ कथित विरासत की सीमा में संकुचित नहीं होना चाहिए , पुनरुत्थानवाद एक बड़े खतरे के रूप में हमारे सामने है................वैसा ही खतरा तब आया था जब भारत ने संवाद की जगह संकुचन चुना था, सातवीं सदी के आस-पास...............तत्कालीन भारत ने ज्ञान के प्रत्येक सूत्र को वेदों में तलाशने की प्रवृत्ति ने भी समाज का नुकसान ही किया.क्योंकि निहित स्वार्थों के कारण समाज का एक वर्ग नए ज्ञान के प्रति उत्सुक्ता और उसके लिए बदलाव की हर स्वाभाविक प्रवृत्ति का निषेध, यह कहकर करता रहा कि उसमें नया कुछ भी नहीं है,वह तो हमारे शास्त्रों में पहले से ही उपलब्ध है. यह मनुष्य की विवेकशीलता की अवमानना जैसा,प्रतीक था, भारत की उस गुलाम मानसिकता का जो वर्तमान से उबरने की छटपटाहट में बार–बार अतीत की ओर पलायन कर रही थी. अतएव सहकार की भावना का जो उभार प्राचीन भारत में देखने को मिलता है, मध्यकाल में आकर वह सहसा अवरुद्ध हो जाता है. परंतु वह ठहरता नहीं है,अवमंदन की स्थिति में भी वह सतत आगे बढ़ता जाता है. भारत में वैदिककाल से ही साहचर्य आधारित उद्यमों को सामाजिक संबंधों के विकास एवं उनके स्थायित्व के लिए, एक अनिवार्य उपक्रम के रूप में स्वीकारा गया. प्रायः सभी सम्राटों ने साहचर्य आधारित समूहों की उपयोगिता को स्वीकारते हुए उन्हें अपने राज्य में सम्मानजनक स्थान दिया, तथापि उनकी भिन्न राजनीतिक–सामाजिक विचारधारा का प्रभाव श्रेणियों के विकास पर भी निरंतर पड़ा. जैसे मौर्यशासन के अंतर्गत जब केंद्रीय सत्ता अपेक्षाकृत मजबूत थी, उन दिनों श्रेणियों को अपने विकास के लिए उतने अनुकूल अवसर नहीं मिल पाए थे, जितने कि आगे चलकर गुप्तकाल के दौरान उन्हें मिले, जो अपेक्षाकृत विकेंद्रीकृत शासन–व्यवस्था थी.कालांतर में जैसे–जैसे समाज का विकास हुआ, मनुष्य की जरूरतें बढ़ीं, नई खोजों ने मानवीय सभ्यता के नए पथों को प्रशस्त किया, तब सहकारिता भी अलग–अलग रूपों में पनपती चली गई.उसका स्वरूप और अधिक जटिल तथा विस्तृत होता चला गया, जो बदली हुई परिस्थतियों में स्वाभाविक ही था. बदलते वक्त के साथ सहकारी संस्थाओं के व्यवसाय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा वे उत्तरोत्तर बहुउद्देश्यीय संगठन के रूप में ढलती चली गईं. लेकिन प्राचीन भारत में,विशेषकर ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी से लेकर ईसा पश्चात छठी शताब्दी तक सहकारी संबंधों का जितना विकास हुआ, उतना आगे के वर्षों में न हो सका. वस्तुतः उसके बाद के वर्षों में भारत आंतरिक रूप से निरंतर कमजोर पड़ने लगा था. विदेशी आक्रमणों के कारण यहां का सामाजिक ढांचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका था. प्रारंभिक भारतीय समाज में जो खुलापन तथा नए ज्ञान को आत्मसात करने की ललक थी, बाद के वर्षों में उसका स्थान रूढ़ियों एवं जड़ परंपराओं ने ले लिया था. गुलाम मानसिकताओं की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि हताशा के क्षणों में वे अक्सर अतीतोन्मुखी बनकर जीने लगती हैं, परिणामस्वरूप विकास उनके लिए छलावा बन जाता है.जो भी हो, सहकारिता जिस स्वतन्त्रय चेतना की अपेक्षा रखती है, बदलती परिस्थितियों एवं राजनीतिक अस्थिरता के चलते, आगे के वर्षों में वह लगातार शिथिल पड़ती गई. इसके बावजूद अनौपचारिक रूप में सहकारिता का प्रभाव हमेशा बना रहा. विशेषकर खेतिहर ग्रामीण समाज में… हमें यह भी दिखाना होगा कि भारत के पक्ष में, उसकी सामासिकता के पक्ष में प्रतिरोध निरन्तर, व्यापक और अदम्य है, और रहेगा........भारत की ताकत को उसकी सामूहिकता और सहकार में पहचान कर आगे बढ़ा जा सकता है, भारत की पुनर्खोज का यह पहला सूत्र होना चाहिए...........(जारी)


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आखिर कैसे सफलता मिले हिंदी पट्टी को -२

आखिर कैसे सफलता मिलेगी हिन्दी पट्टी को - भाग 2 मुखर्जी नगर में आजकल एक धरना चल रहा है , csat से दुष्प्रभावित लोगों को न्याय दिलाने हेतु अतिरिक्त अटेम्प्ट की माँग हेतु !... पर एक दिन उधर से गुजरते हुये कुछ अन्य मुद्दों पर ऐसी बातें कान में पड़ीं , जो अच्छी नहीं लगीं मुझे .... कोचिंग , शिक्षक गणों और आयोग को दोष देकर आप कुछ भी हासिल नहीं कर सकते !... मैं नहीं कहता कि इनमें कोई कमी नहीं है , ये त्रुटि विहीन हैं पर इनमें परिवर्तन लाने मात्र से ही आपका चयन हो जायेगा ?....नहीं !.... आपका चयन होगा खुद में समयानुकूल बदलाव करने से , जिसकी कोई बात नहीं करना चाह रहा ...सब पुराने फंडों से अपना -2 समय काट रहे हैं ... कुछ लोग अपने फर्जी आँकड़ों का कटिया लेकर बैठे हैं मछली फाँसने को तो कुछ लोग बहानों की भारी गठरी लेकर चले जा रहें ताकि मीलों चलने पर भी बहाने खत्म न हों .....पर हमें तो वह रास्ता चाहिये जो हमें लक्ष्य तक पहुँचाये ... इस के लिये हमें सुधारों के पीछे की वास्तविक मंशा को समझना होगा , षडयंत्र सिद्धांत को भूलकर !.... आज हर स्तर पर नवोन्मेष की बात की जा रही है , इसी शब्द पर विचार करके आगे बढ़ना होगा ... नये सुधारों का उद्दयेश्य भी नवोन्मेष को बढ़ावा देना है .. हमें भाषा , विचारों के स्तर पर वह स्तर प्राप्त करना होगा ... ( पर क्या यह हमें वे कोचिंग्स दे सकते हैं जो अपने विग्यापनों में भी सही वर्तनी लिख पाने में अक्षम हैं ? )... यह लम्बा रास्ता है जो हमें खुद ही तय करना होगा , शेष लोग तो बस आपको दिशा बता सकते हैं ... इसके लिये आपको अपनी तैयारी 3 चक्रों में करनी होगी ... पहला चक्र बेसिक्स क्लियर करने का है ... दूसरा चक्र विशेषग्यता हासिल करने का है ..उत्तर लेखन की, तथ्यों के विश्लेषण की विशेषग्यता सबसे अहम है ... इसी चक्र में आपकी मदद कोचिंग कर सकती हैं ... लेकिन तीसरा चक्र भाषायी और वैचारिक मौलिकता प्राप्त करने का है , जो वास्तव में आजीवन चलता रह सकता है पर upsc में सफल होने भर की मौलिकता पाना अगर लक्ष्य है तो प्रतिदिन 100 पेज स्वतन्त्र अध्ययन करने , 500 शब्द अपने मन से लिखने और 2 प्रश्न प्रतिदिन मुख्य परीक्षा के लिये लिखने का अभ्यास करना होगा ! ..इनसे सम्बन्धित विषय सामाग्री मैं कमेंट बॉक्स में देना चाहूँगा ... क्योंकि उससे ज़रूरी कुछ रणनीतियों पर पहले चर्चा करना चाहूँगा ... पहला प्रश्न तो यही उठता है कि हमें इस तैयारी में कितना वक्त चाहिये ...साल भर , दो साल ...अथवा 5 साल ?...... मेरा उत्तर यही होता है कि यदि आप स्नातक स्तर पर अच्छा कमांड रखते हैं तो आपको सिर्फ एक साल चाहिये ...पर दुर्भाग्य से हिन्दी माध्यम की शिक्षा प्रणाली में आप पोस्ट ग्रेजुएट होकर सिर्फ कक्षा 8 तक की जानकारी और बौद्धिकता रख रहे होते हैं ... यहीं कोचिंग , मार्ग दर्शकों का काम शुरू होता है ..उन्हें आप को सबसे पहले स्नातक स्तर पर लाना होता है , पर इससे आगे का काम हमेशा आपको खुद करना होता है , वह है अभ्यास का !.... फिलहाल आपको पता है कि प्री में मुझे 105+ और मेंस में 750+ लाने की तैयारी करनी है ... उस स्तर पर आप पहुँच गये हैं इसे टेस्ट सीरीज , आपके मार्ग दर्शक, ग्रुप आदि निर्धारित कर सकते हैं .... मेरा मानना है कि साल भर आपको GS के 200*4 यानी 800 प्रश्नों का पूल बनाकर हल करना चाहिये , ये सभी संभावित प्रश्नों का पूल हो ... ऐसे ही वैकल्पिक विषय के 200 प्रश्नों के पूल को हल करें ... परीक्षा हाल में जानें से पहाले कम से कम 40 निबंध तो आप लिखकर अभ्यास कर ही लें ... एक बात ध्यान रखें इनका स्रोत मौलिक हो घिसा पिटा नहीं ... वह उस स्तर के विचारों से युक्त हो जिस स्तर पर upsc के परीक्षक सोचते , पढ़ते एवं विचार करते हैं ... प्री के पाठ्य क्रम में अभ्यास का बहुत महत्व है ..ज़ितनी अधिक बार आप माडल पेपर हल करेंगे उतना ही आत्म विश्वास और अनुभव अर्जित कर सकेंगे .... ध्यान रखें आपका मुकाबला सिर्फ आपसे है .... अन्य किसी से नहीं , आप उस स्तर के हैं जिसकी अपेक्षा upsc को है तो आपको कोई रोंक नहीं सकता यदि आपने अपने को परिश्रम और अभ्यास से लैस कर रखा है ... शेष जो भी छूटता लगेगा कमेंट बॉक्स में डालता जाऊँगा ... शुभकामनायें !
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आखिर कैसे सफलता मिलेगी हिंदी पट्टी को

आखिर कैसे सफलता मिले हिन्दी पट्टी को ??.......... (1) आखिर लोग कोचिंग की भूमिका पर इतना सवाल क्यूँ उठा रहे हैं? ............. अगर कोई कोचिंग 1000 लोगों को कोच कर रही हो और उसमें वह 10लोगों का चयन कराने का दावा करे तो उसे यह भी तो बताना चाहिये कि क्या कारण था कि वह अन्य 990 लोगों का चयन नहीं करा सकी !......या फिर उनको मान लेना चाहिये कि वास्तव में चयन एक व्यक्तिगत उपलब्धि है , कोचिंग कोई गारंटी नहीं महज एक ज़रिया है ... कोचिंग वही सबसे अच्छी है जो समय पर कोर्स पूरा कर सके , उसके पास एक बेहतर कंटेंट टीम हो , अच्छे मूल्याँकन में सिद्धहस्त परीक्षक हों , जो भी वादा करे उसे पूरा करे, वह अच्छे शिक्षकों से युक्त हो ... उसके पास प्री , मेंस और इंटरव्यू का संतुलित और प्रभावी प्रशिक्षण तरीका हो ....इस दृष्टि से हिन्दी माध्यम में अंग्रेजी माध्यम से कम सक्षम संस्थायें नहीं हैं ...अंग्रेजी माध्यम के अधिकांश अच्छे प्रतियोगी बाजीराम में पढ़ते हैं तो जाहिर है वहीं से परिणाम भी अधिक होंगे ..पर क्या ये परिणाम 10 प्रतिशत भी होते हैं ....नहीं ....यानी यहाँ भी 90 प्रतिशत लोग परिणाम नहीं दे पाते ......फिर कोचिंग को निर्णायक क्यूँ माना जा रहा है ?.... चूँकि हमें एक समयबद्ध मार्ग दर्शन की ज़रूरत होती है , चूँकि हमें स्कूल -कालेज की पढ़ाई के बाद अपने सपने पूरे करने के लिये अनुभवी मार्ग दर्शकों की ज़रूरत पड़ती है इसलिये हम कोचिंग करते हैं ....पर सैकड़ों दुकानों में विश्वसनीय कौन है , इसका मूल्यांकन विग्यापनों के अतिशयोक्ति दावे नहीं कर सकते , इसके लिये सबसे पहले यह देखना होता है हमें ज़रूरत क्या है ? और इस ज़रूरत को कौन संस्था पूरा कर सकती है .... उसकी प्रामाणिकता उसे चलाने वालों की योग्यता और अनुभव पर टिकी होनी चाहिये ...न कि परिणामों की संख्या के सन्दिग्ध घटाटोप द्वारा ...upsc में सीट 1000 के आस -पास होती हैं पर कोचिंग्स के सभी दावों को मिला दिया जाये तो हर साल 10 हज़ार ias तो ज़रूर निकलने चाहिये ...चलिये एकाध मामलों में आदमी कई कोचिंग कर सकता है , पर दावे निश्चय ही संदिग्ध ही होते हैं ... ऐसे में कोचिंग चाहने वालों को काफी सावधानी बरतनी होगी ...ताकि आप किसी घटिया कोचिंग के आसमानी दावों के शिकार न हो जायें ... कोचिंग आप सीखने के लिये करें , नियमित होने के लिये करें , अपने को टेस्ट करने के लिये करें , अच्छी सरकिल की संभावना के लिये करें , अच्छे -अपडेट नोट्स के लिये करें .....पर कभी खुश-फहमी में न रहें कि कोचिंग करने मात्र से ही आप ias बन जायेंगे क्योंकि देश भर में 1 लाख लोग सूचना के स्तर पर इस योग्य हैं कि ias बन सकते हैं ...आमतौर पर ये सूचना इन्हें कोचिंग ने ही प्रदान की है ...पर संघर्ष तो हज़ार में आने का है ..यह तभी हो सकता है जब आप विचार और भाषा के स्तर पर अपने को मांज सकें ...इसमें कोचिंग बहुत कम मदद इसलिये कर पायेगी क्योंकि यह लम्बी प्रक्रिया है ...भाषा व विचार दशकों में बनते हैं .. स्कूलिंग की इसमें बहुत बड़ी भूमिका होती है , अच्छी संगति और ग्रुप भी प्रभाव डालती है ...हाँ हिन्दी के संकट को देखते हुये कोचिंग सेमिनार , क्विज , डीबेट , वीक एंड एकेडमिया जैसे उपायों को आजमा कर विचार एवं भाषा निर्माण को गति दे सकती हैं , वे दो तरफा संवाद की क्षमता वाले शिक्षकों को प्रमोट कर सकती हैं , टेस्ट सीरीज का स्तर बढ़ा सकती हैं ...पर वे ias तब तक नहीं बना सकती हैं जब तक आप खुद न चाहें .....आप के चाहने से तात्पर्य यह है कि आप यह समझने लगें कि आपको upsc के परीक्षकों के स्तर तक विचार एवं भाषा का स्तर ले जाना ही होगा ...इसके लिये कुंजी-गाइड और नोट्स ही पर्याप्त नहीं होंगे ...आपको भारत के बारे में , आर्थिकी के बारे में , नीतियों के बारे में , राजनीति और समाज के बारे में , संस्कृतियों के बारे में , विग्यान एवं पर्यावरण के बारे में वह पढ़ना होगा जो परीक्षक और पेपर सेटर खुद पढ़ते हैं ...यानी अधिकारी और समर्थ लेखकों के समूह को पढ़कर आपको अपने स्तर को उठाकर upsc के स्तर का करना होगा , इसके लिये अच्छे खासे अभ्यास और धैर्य की ज़रूरत होगी साथ में ज़रूरत होगी उचित मार्ग दर्शन एवं दिशा की ...हिन्दी पट्टी को वह गैप पाटने का काम करना ही होगा जो खराब शिक्षा व्यवस्था ने पैरों में बेड़ियों की तरह उनमें बांध दी हैं ..उसे कुयें का मेढ़क बनना छोड़ ग्लोबल बनना होगा , द्विभाषी बनना होगा ... क्षेत्रीय pcs , यूनिवर्सिटी के पैटर्न को यहाँ आजमाने से बाज आना होगा , मौलिक और नवोन्वेषी विचार लाने होंगे ...और यह असंभव नहीं है , जब वे इसे कर सकते हैं जो सेलेक्ट हो रहे हैं तो आप भी कर सकते हैं बशर्ते आप ज़ड़ता छोड़ upsc की वास्तविक माँग पर फोकस करें ........... खुद पर विश्वास रखें , व्यवस्था पर विश्वास रखें ... 

Wednesday, 1 June 2016

सिविल सेवाओं में आखिर कैसे हो हिंदी पट्टी की नैया पार ?

२०१६ के सिविल सेवा परिणाम ने हिंदी भाषियों को न केवल हताश और कुंठित किया है बल्कि तंत्र और कोचिंग संस्थाओं के प्रति भी एक गहरी नाराज़गी का भाव उभर कर आया है ....सवाल अब यह है कि इस दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति को ख़त्म करने के लिए कोचिंग व्यवस्था और हिंदी पट्टी के पास कौन से विकल्प हैं , जिसे आज़मा कर हिंदी भाषी लोग  अपना यथोचित स्थान पा सकते हैं ...१)..कोचिंग्स को चाहिए कि वे अपने यहाँ एक परमानेंट एक्सरसाइज एंड गाइडेंस प्रोग्राम चलायें ...इनसे जुड़े बच्चों को टेस्ट द्वारा छांटकर लगातार विशेष निगरानी में रखकर प्रशिक्षित किया जाये .....२) कोचिंग के क्लास रूम कार्यक्रम में एकतरफा लेक्चर प्रणाली की जगह पर संवाद युक्त प्रणाली को धीरे -२ लोकप्रिय और लागू किया जाये ...... ३) एक सतत संवाद कार्यक्रम चलाया जाये जिसमे हर १५ दिन पर क्विज , सेमिनार , GD,डिबेट, टापर्स मीट.... आदि का आयोजन होता रहे .........4) हर कोचिंग अपने छात्रों का मोराल बूस्ट अप करने के लिए टेस्ट न कराये बल्कि उनकी वास्तविक स्थिति को दर्शाने वाले टेस्ट हों , आतंरिक और वाह्य दोनों तरह की टेस्ट सीरिज का उच्च स्तरीय होना परिणाम प्राप्त करने हेतु बेहद अहम है ...... 5) छात्रों की रचनात्मकता बढ़ाने हेतु वाल मैगजीन एक प्रभावी माध्यम बन सकती है ... ६) बड़ी से बड़ी हिंदी माध्यम कोचिंग के पास अच्छी लाइब्रेरी का अभाव चौकाने वाला है ..यह स्वाध्याय और कोचिंग - छात्र सहभागिता दोनों के अभाव को प्रदर्शित करता है , कोचिंग इसे प्रोफेशनल ढंग से भी चला सकती हैं कैंटीन आदि की सुविधा सहित , आखिरकार बाहर बच्चे लाइब्रेरी संस्कृति से जुड़े ही हुए हैं तो कोचिंग को हाथ आजमाने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए .... ७ ) हर कोचिंग की अपनी वेबसाइट भी है जो प्रभावशाली नहीं हैं , उनपर भी कोचिंग्स को और परिश्रम करना चाहिए .......................... छात्रों को भी अपनी पढाई का ढांचा बदलना होगा ...१) उन्हें अपने कंटेंट लेबल को ज्यादा विविध और स्तरीय बनाना ही होगा , उस स्तर का जिस स्तर पर UPSC के परीक्षक सोचते और पढ़ते हैं ...................२) यह परीक्षा अत्यधिक अभ्यास पर निर्भर है , ऐन परीक्षा के पहले पढ़कर सबसे पहला जवाब परीक्षा हॉल में लिखना आत्म घाती है ...उत्तर लेखन का निरंतर अभ्यास ही सफलता की गारंटी दे सकता है ... ३) अच्छे ग्रुप का निर्माण भी एक परिवर्तनकारी कदम हो सकता है .......................4 ) कॉपी -बुक स्टाइल की पढाई का ज़माना हमेशा रहेगा पर UPSC में नवोन्मेष की नयी मांग हेतु स्वाध्याय के क्षेत्र को विस्तृत करना एक अनिवार्य जरुरत है हिंदी पट्टी हेतु ....... 5 ) इंटरनेट का समुचित प्रयोग करके कैसे हम हिंदी भाषी होने और न होने के बीच के अंतर को पाटने पर काम करें , यह एक मौजू प्रश्न है .............................६) आम तौर हिंदी भाषी लोग क्षेत्रीय पीसीएस भी देते हैं जिसका स्तर और प्रकृति दोनों UPSC से भिन्न होती है , पर अक्सर हिंदी पट्टी का प्रतियोगी पीसीएस स्तर के उत्तर UPSC में भी लिखकर आते हैं ... यह उनकी असफलता के बड़े कारणों में से एक है ..... ७ ) नियमित डायरी लेखन तथा प्रतिदिन अपने मन से लिखने की आदत सफलता के करीब ले जाती है , इसे तुरंत दिनचर्या में शामिल करें ..... ८ ) हिंदी भाषियों को शुरू से द्विभाषी होने पर जोर देना ही होगा ..................९ ) रुचियों में विविधता पैदा करें ...दुनिया की नियामतों से जुड़ें , स्वस्थ जीवन शैली अपनाएं .... उपरोक्त तरीके अपनाएं , अपनी कोचिंग संस्थाओं से  सुधारों की तरफ प्रवित्त होने का अनुरोध करें .... सफलता बस आपके सही प्रयास के इंतजार में है ...........................शुभकामनाएं!

मेरी प्रिय कविता -३

विश्व कविता में एमेनुअल आर्तेज कोई बहुत बड़ा नाम नहीं है , पर उनकी कविता '' एक मिनट का मौन '' मेरे द्वारा पढ़ी गयी सबसे अद्भुत कविता है ...मैं कह सकता हूँ कि इसे पढ़ने के बाद आप वह नहीं रह जायेंगे जो पहले थे ....................................................................................................................................................................इससे पहले कि मैं यह कविता पढ़ना शुरू करूँ
मेरी गुज़ारिश है कि हम सब एक मिनट का मौन रखें
ग्यारह सितम्बर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन में मरे लोगों की याद में
और फिर एक मिनट का मौन उन सब के लिए जिन्हें प्रतिशोध में
सताया गया, क़ैद किया गया
जो लापता हो गए जिन्हें यातनाएं दी गईं
जिनके साथ बलात्कार हुए एक मिनट का मौन
अफ़गानिस्तान के मज़लूमों और अमरीकी मज़लूमों के लिए

और अगर आप इज़ाजत दें तो

एक पूरे दिन का मौन
हज़ारों फिलस्तीनियों के लिए जिन्हें उनके वतन पर दशकों से काबिज़
इस्त्राइली फ़ौजों ने अमरीकी सरपरस्ती में मार डाला
छह महीने का मौन उन पन्द्रह लाख इराकियों के लिए, उन इराकी बच्चों के लिए,
जिन्हें मार डाला ग्यारह साल लम्बी घेराबन्दी, भूख और अमरीकी बमबारी ने

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ

दो महीने का मौन दक्षिण अफ़्रीका के अश्वेतों के लिए जिन्हें नस्लवादी शासन ने
अपने ही मुल्क में अजनबी बना दिया। नौ महीने का मौन
हिरोशिमा और नागासाकी के मृतकों के लिए, जहाँ मौत बरसी
चमड़ी, ज़मीन, फ़ौलाद और कंक्रीट की हर पर्त को उधेड़ती हुई,
जहाँ बचे रह गए लोग इस तरह चलते फिरते रहे जैसे कि जिंदा हों।
एक साल का मौन विएतनाम के लाखों मुर्दों के लिए...
कि विएतनाम किसी जंग का नहीं, एक मुल्क का नाम है...
एक साल का मौन कम्बोडिया और लाओस के मृतकों के लिए जो
एक गुप्त युद्ध का शिकार थे... और ज़रा धीरे बोलिए,
हम नहीं चाहते कि उन्हें यह पता चले कि वे मर चुके हैं। दो महीने का मौन
कोलम्बिया के दीर्घकालीन मृतकों के लिए जिनके नाम
उनकी लाशों की तरह जमा होते रहे
फिर गुम हो गए और ज़बान से उतर गए।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ।

एक घंटे का मौन एल सल्वादोर के लिए
एक दोपहर भर का मौन निकारागुआ के लिए
दो दिन का मौन ग्वातेमालावासिओं के लिए
जिन्हें अपनी ज़िन्दगी में चैन की एक घड़ी नसीब नहीं हुई।
45 सेकेंड का मौन आकतिआल, चिआपास में मरे 45 लोगों के लिए,
और पच्चीस साल का मौन उन करोड़ों गुलाम अफ्रीकियों के लिए
जिनकी क़ब्रें समुन्दर में हैं इतनी गहरी कि जितनी ऊंची कोई गगनचुम्बी इमारत भी न होगी।
उनकी पहचान के लिए कोई डीएनए टेस्ट नहीं होगा, दंत चिकित्सा के रिकॉर्ड नहीं खोले जाएंगे।
उन अश्वेतों के लिए जिनकी लाशें गूलर के पेड़ों से झूलती थीं
दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम

एक सदी का मौन

यहीं इसी अमरीका महाद्वीप के करोड़ों मूल बाशिन्दों के लिए
जिनकी ज़मीनें और ज़िन्दगियाँ उनसे छीन ली गईं
पिक्चर पोस्ट्कार्ड से मनोरम खित्तों में...
जैसे पाइन रिज वूंडेड नी, सैंड क्रीक, फ़ालन टिम्बर्स, या ट्रेल ऑफ टियर्स।
अब ये नाम हमारी चेतना के फ्रिजों पर चिपकी चुम्बकीय काव्य-पंक्तियाँ भर हैं।

तो आप को चाहिए खामोशी का एक लम्हा ?
जबकि हम बेआवाज़ हैं
हमारे मुँहों से खींच ली गई हैं ज़बानें
हमारी आखें सी दी गई हैं
खामोशी का एक लम्हा
जबकि सारे कवि दफनाए जा चुके हैं
मिट्टी हो चुके हैं सारे ढोल।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ
आप चाहते हैं एक लम्हे का मौन
आपको ग़म है कि यह दुनिया अब शायद पहले जैसी नहीं रही रह जाएगी
इधर हम सब चाहते हैं कि यह पहले जैसी हर्गिज़ न रहे।
कम से कम वैसी जैसी यह अब तक चली आई है।

क्योंकि यह कविता 9/11 के बारे में नहीं है
यह 9/10 के बारे में है
यह 9/9 के बारे में है
9/8 और 9/7 के बारे में है
यह कविता 1492 के बारे में है।

यह कविता उन चीज़ों के बारे में है जो ऐसी कविता का कारण बनती हैं।
और अगर यह कविता 9/11 के बारे में है, तो फिर :
यह सितम्बर 9, 1973 के चीले देश के बारे में है,
यह सितम्बर 12, 1977 दक्षिण अफ़्रीका और स्टीवेन बीको के बारे में है,
यह 13 सितम्बर 1971 और एटिका जेल, न्यू यॉर्क में बंद हमारे भाइयों के बारे में है।

यह कविता सोमालिया, सितम्बर 14, 1992 के बारे में है।

यह कविता हर उस तारीख के बारे में है जो धुल-पुँछ रही है कर मिट जाया करती है।
यह कविता उन 110 कहानियो के बारे में है जो कभी कही नहीं गईं, 110 कहानियाँ
इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में जिनका कोई ज़िक्र नहीं पाया जाता,
जिनके लिए सीएनएन, बीबीसी, न्यू यॉर्क टाइम्स और न्यूज़वीक में कोई गुंजाइश नहीं निकलती।
यह कविता इसी कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिए है।

आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए ?
हम आपको दे सकते हैं जीवन भर का खालीपन :
बिना निशान की क़ब्रें
हमेशा के लिए खो चुकी भाषाएँ
जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों से उखड़े हुए इतिहास
अनाम बच्चों के चेहरों से झांकती मुर्दा टकटकी
इस कविता को शुरू करने से पहले हम हमेशा के लिए ख़ामोश हो सकते हैं
या इतना कि हम धूल से ढँक जाएँ
फिर भी आप चाहेंगे कि
हमारी ओर से कुछ और मौन।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रोक दो तेल के पम्प
बन्द कर दो इंजन और टेलिविज़न
डुबा दो समुद्री सैर वाले जहाज़
फोड़ दो अपने स्टॉक मार्केट
बुझा दो ये तमाम रंगीन बत्तियां
डिलीट कर दो सरे इंस्टेंट मैसेज
उतार दो पटरियों से अपनी रेलें और लाइट रेल ट्रांजिट।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन, तो टैको बैल की खिड़की पर ईंट मारो,
और वहां के मज़दूरोंका खोया हुआ वेतन वापस दो। ध्वस्त कर दो तमाम शराब की दुकानें,
सारे के सारे टाउन हाउस, व्हाइट हाउस, जेल हाउस, पेंटहाउस और प्लेबॉय।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रहो मौन ''सुपर बॉल'' इतवार के दिन
फ़ोर्थ ऑफ़ जुलाई के रोज़
डेटन की विराट 13-घंटे वाली सेल के दिन
या अगली दफ़े जब कमरे में हमारे हसीं लोग जमा हों
और आपका गोरा अपराधबोध आपको सताने लगे।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो अभी है वह लम्हा
इस कविता के शुरू होने से पहले।

( 11 सितम्बर, 2002 )