Friday, 3 June 2016

भारत एक पुनर्खोज -१

ईस्ट इंडिया कंपनी के एक शुरुआती अधिकारी जॉर्ज लिंड्से जॉनस्टोन ने 1801 में लंदन में संसद में बहुत गहरी बात कही थी कि भारत में ब्रिटेन का साम्राज्य सोच का साम्राज्य है और यह अपनी शक्ति को पहचानने से भारतवासियों के इनकार की बुनियाद पर खड़ा है. अपनी ताकत को पहचानने में आम भारतीयों की आनाकानी जॉनस्टोन के जमाने में ब्रिटिश हुकूमत के सामने भारत की गुलामी जारी रहने की प्रमुख वजह थी. कुछ हद तक भारत के राजनैतिक हालात की वजह से यह आज भी सच है कि सुविधाविहीन भारतीय जागृत होने और खुद को इस असाधारण वंचना से तेजी से और हमेशा के लिए मुक्त किए जाने की मांग करने में हिचकते हैं. तथाकथित आम आदमी कहलाने वाले, सबसे संपन्न न सही फिर भी अपेक्षाकृत संपन्न लोगों की शिकायतें जोरदार ढंग से उछाली जाती हैं. इसके विपरीत भारतीय समाज में वास्तविक कमजोर वर्गों की लंबे समय से जारी जबरदस्त वंचना पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है.
इस सबके बावजूद भारत की लोकतांत्रिक राजनीति सबसे वंचित देशवासियों को अपनी शक्ति को पहचानने और यह मांग करने के अवसर देती है कि देश की इतनी विशाल आबादी का जीवन बर्बाद करने वाली बेहद अहम असमानताओं को जल्दी से जल्दी दूर किया जाए.....तो क्या आज़ादी के सत्तरवें साल में भी यह प्रवित्ति बदली है ?.....अथवा हम यूँ ही रह गए हैं ?...ऐसा नहीं है कि कुछ भी नहीं बदला है...पर भारतीय अपने सहज संकोची भलमनसाहत की वजह से हर जगह धीमे और ढीले हैं....वीरेन डंगवाल तो संकेत भी कर रहे हैं इसी प्रवित्ति पर-
इतने भले नहीं बन जाना साथी जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कुव्वत सारी प्रतिभा किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया?
इतने दुर्गम मत बन जाना सम्भव ही रह जाय न तुम तक कोई राह बनाना अपने ऊंचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना
इतने चालू मत हो जाना सुन-सुन कर हरक़ते तुम्हारी पड़े हमें शरमाना बग़ल दबी हो बोतल मुँह में जनता का अफसाना ऐसे घाघ नहीं हो जाना
ऐसे कठमुल्ले मत बनना बात नहीं हो मन की तो बस तन जाना दुनिया देख चुके हो यारो एक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव कठमुल्लापन छोड़ो उस पर भी तो तनिक विचारो
काफ़ी बुरा समय है साथी गरज रहे हैं घन घमण्ड के नभ की फटती है छाती अंधकार की सत्ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती इनकी असल समझना साथी अपनी समझ बदलना साथी
ऐसा क्यों है कि यह समाज बदहाल स्थिति में जी रहा है? कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं दिखती जैसे कि लोग चुक गए हों?इसका एक बहुत बड़ा कारण है हमारे भीतर यथास्थिति को स्वीकार करने कि प्रवृति का आना. यह परिवर्तन बहुत मायने रखता है. इसी कारण विरोध या संघर्ष आज चेतना के स्तर पर न होकर पावर के स्तर पर होने लगा है. परिवर्तन की आकांक्षा अगर ‘सत्ता’ के लिए हो, ‘पावर’ के लिए हो तो जिस तरह का नैतिक आंदोलन जयप्रकाश जी या गांधी जी ने किया था, नामुमकिन हो जाता है. यहां तो स्थिति आज यह है कि जिस चीज या कि मुद्दे को उठाओ उसे अपने सत्ता में आने कि प्रक्रिया को तेज करने का साधन भर समझ लो. जनता के हित की बात यहां नहीं होती. हर कमी, हर न्यूनता को यहां वैयक्तिक और निजी स्वार्थ के हित में कैश करवाया जाता है. हम-आप सभी जब निज पर केन्द्रित हो चलेंगे तो कहां की और कैसी सुगबुगाहट?
यह समय, दुर्भाग्य से बिखरने-टूटने-बंटने का कुसमय होता जा रहा है. ऐसी शक्तियां जो अपने मूल में, भारतीय परपंरा की नासमझी, बुद्धिहीन विरोध से, संकीर्ण देशप्रेम से, भारतीय लोकतंत्र की छूटों और कमज़ोरियों का दुरुपयोग करते हुए पनपी हैं, हिंसक-आक्रामक-हत्यारी हो रही हैं. छिछली धार्मिकता, उथला अध्यात्म, सतही आधुनिकता आदि का एक विचित्र अबूझ गड्डमड्ड उस भारत को तोड़ने में सक्रिय हो गया है जो सदियों से, समझ और जतन से, अद्वितीय समावेश और पारस्परिकता से, अदम्य बहुलता और बौद्धिक-नैतिक दार्शनिक वाद-विवाद-संवाद से रचाया-बसाया गया था और अब तक, सारे विचलनों और विभ्रमों के बावजूद, सक्रिय और जीवित है
इस भारत को कोई कट्टरता, कोई असहिष्णुता कोई देशप्रेम या देशद्रोह आसानी से नष्ट नहीं कर सकता, भले उसके पास संख्या, बाहु, शस्त्र या आतंक का कितना ही बल क्यों न हो. इसे याद रखने की ज़रूरत है. पर यह याद करने की भी कि इसलिए जो हो रहा है उसके प्रतिरोध को अनेक स्तरीय, सशक्त और सकर्मक बनाने का प्रयत्न होना चाहिए पर वह सिर्फ कथित विरासत की सीमा में संकुचित नहीं होना चाहिए , पुनरुत्थानवाद एक बड़े खतरे के रूप में हमारे सामने है................वैसा ही खतरा तब आया था जब भारत ने संवाद की जगह संकुचन चुना था, सातवीं सदी के आस-पास...............तत्कालीन भारत ने ज्ञान के प्रत्येक सूत्र को वेदों में तलाशने की प्रवृत्ति ने भी समाज का नुकसान ही किया.क्योंकि निहित स्वार्थों के कारण समाज का एक वर्ग नए ज्ञान के प्रति उत्सुक्ता और उसके लिए बदलाव की हर स्वाभाविक प्रवृत्ति का निषेध, यह कहकर करता रहा कि उसमें नया कुछ भी नहीं है,वह तो हमारे शास्त्रों में पहले से ही उपलब्ध है. यह मनुष्य की विवेकशीलता की अवमानना जैसा,प्रतीक था, भारत की उस गुलाम मानसिकता का जो वर्तमान से उबरने की छटपटाहट में बार–बार अतीत की ओर पलायन कर रही थी. अतएव सहकार की भावना का जो उभार प्राचीन भारत में देखने को मिलता है, मध्यकाल में आकर वह सहसा अवरुद्ध हो जाता है. परंतु वह ठहरता नहीं है,अवमंदन की स्थिति में भी वह सतत आगे बढ़ता जाता है. भारत में वैदिककाल से ही साहचर्य आधारित उद्यमों को सामाजिक संबंधों के विकास एवं उनके स्थायित्व के लिए, एक अनिवार्य उपक्रम के रूप में स्वीकारा गया. प्रायः सभी सम्राटों ने साहचर्य आधारित समूहों की उपयोगिता को स्वीकारते हुए उन्हें अपने राज्य में सम्मानजनक स्थान दिया, तथापि उनकी भिन्न राजनीतिक–सामाजिक विचारधारा का प्रभाव श्रेणियों के विकास पर भी निरंतर पड़ा. जैसे मौर्यशासन के अंतर्गत जब केंद्रीय सत्ता अपेक्षाकृत मजबूत थी, उन दिनों श्रेणियों को अपने विकास के लिए उतने अनुकूल अवसर नहीं मिल पाए थे, जितने कि आगे चलकर गुप्तकाल के दौरान उन्हें मिले, जो अपेक्षाकृत विकेंद्रीकृत शासन–व्यवस्था थी.कालांतर में जैसे–जैसे समाज का विकास हुआ, मनुष्य की जरूरतें बढ़ीं, नई खोजों ने मानवीय सभ्यता के नए पथों को प्रशस्त किया, तब सहकारिता भी अलग–अलग रूपों में पनपती चली गई.उसका स्वरूप और अधिक जटिल तथा विस्तृत होता चला गया, जो बदली हुई परिस्थतियों में स्वाभाविक ही था. बदलते वक्त के साथ सहकारी संस्थाओं के व्यवसाय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा वे उत्तरोत्तर बहुउद्देश्यीय संगठन के रूप में ढलती चली गईं. लेकिन प्राचीन भारत में,विशेषकर ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी से लेकर ईसा पश्चात छठी शताब्दी तक सहकारी संबंधों का जितना विकास हुआ, उतना आगे के वर्षों में न हो सका. वस्तुतः उसके बाद के वर्षों में भारत आंतरिक रूप से निरंतर कमजोर पड़ने लगा था. विदेशी आक्रमणों के कारण यहां का सामाजिक ढांचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका था. प्रारंभिक भारतीय समाज में जो खुलापन तथा नए ज्ञान को आत्मसात करने की ललक थी, बाद के वर्षों में उसका स्थान रूढ़ियों एवं जड़ परंपराओं ने ले लिया था. गुलाम मानसिकताओं की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि हताशा के क्षणों में वे अक्सर अतीतोन्मुखी बनकर जीने लगती हैं, परिणामस्वरूप विकास उनके लिए छलावा बन जाता है.जो भी हो, सहकारिता जिस स्वतन्त्रय चेतना की अपेक्षा रखती है, बदलती परिस्थितियों एवं राजनीतिक अस्थिरता के चलते, आगे के वर्षों में वह लगातार शिथिल पड़ती गई. इसके बावजूद अनौपचारिक रूप में सहकारिता का प्रभाव हमेशा बना रहा. विशेषकर खेतिहर ग्रामीण समाज में… हमें यह भी दिखाना होगा कि भारत के पक्ष में, उसकी सामासिकता के पक्ष में प्रतिरोध निरन्तर, व्यापक और अदम्य है, और रहेगा........भारत की ताकत को उसकी सामूहिकता और सहकार में पहचान कर आगे बढ़ा जा सकता है, भारत की पुनर्खोज का यह पहला सूत्र होना चाहिए...........(जारी)


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2 comments:

  1. वहाबियों का मानना है कि इमाम हुसैन की हत्या करने वाला यज़ीद अमीरुल मोमेनीन है और इमाम हुसैन ने उसके विरुद्ध आंदोलन करके इस्लामी ख़लीफ़ा के विरुद्ध विद्रोह किया था!!! (HN)

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  2. यही वहाबी भारत और दुनिया भर में फ़साद की जड़ हैं ....

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